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सत्यनारायण व्रत कथा हिंदी में आस्था और अच्छे कर्मों का प्रतीक !! Satyanarayan Vrat Katha in Hindi symbol of faith and good deeds!!

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सत्यनारायण व्रत कथा हिंदी में आस्था और अच्छे कर्मों का प्रतीक

सत्यनारायण व्रत कथा, हिन्दू धर्म में प्रसिद्ध एक व्रत कथा है जो सत्यनारायण भगवान की पूजा करने के रूप में मान्यता प्राप्त करती है। यह व्रत कथा भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप का प्रतीक है। कुछ लोग इसे अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए करते हैं, जबकि कुछ लोग नियमित रूप से इसे आयोजित करते हैं। व्रत कथा में व्रत-पूजा और कथा दो भागों में बांटी गयी है। यह कथा स्कन्दपुराण के रेवाखण्ड से लिया गया है।

Table of Contents

सत्यनारायण व्रत कथा का महत्व इसके नाम से ही स्पष्ट हो जाता है। इस व्रत में अलग-अलग रूपों में भगवान की पूजा की जाती है, और इस कथा में उनके सत्यनारायण स्वरूप का वर्णन है। इसे संस्कृत में लिखे गए लगभग 170 श्लोकों के मार्गदर्शन में दिया गया है, जो पाँच अध्यायों में बंटे हुए हैं। इस कथा में दो प्रमुख विषय हैं- पहला है संकल्प का महत्वशाली भावना और दूसरा है प्रसाद की महत्ता और अपमान का प्रतिक्रियात्मक असर।

व्रत कथा के अध्यायों में विभिन्न छोटी-छोटी कथाएं हैं जो सत्य का पालन न करने के परिणाम के रूप में किस प्रकार की समस्याएं आ सकती हैं। यह दिखाता है कि मनुष्य को अपने जीवन में सत्य व्रत का पालन सच्ची निष्ठा और दृढ़ता के साथ करना चाहिए। इसके विपरीत कार्य करने पर भगवान न केवल नाराजगी करते हैं, बल्कि धन और सुख से वंचित करके दण्ड भी दे सकते हैं। यह व्रत कथा सत्यता की महत्वपूर्ण और प्रमुख धार्मिक कथाओं में से एक है जो लोक में प्रसिद्ध है। इसे आमतौर पर पूर्णिमा के दिन परिवार में पाठ किया जाता है। इसके अतिरिक्त, अन्य तिथियों पर इसे विधि के अनुसार भी किया जा सकता है।

सत्यनारायण व्रत कथा विधि

सत्यनारायण व्रत कथा के दौरान केले के पत्ते और फल के अलावा पंचामृत, पंचगव्य, सुपारी, पान, तिल, मोली, रोली, कुमकुम, दूर्वा और अन्य सामग्री की आवश्यकता होती है। सत्यनारायण व्रत कथा की पूजा में दूध, मधु, केला, गंगाजल, तुलसी पत्ते, मेवा को मिलाकर पंचामृत तैयार किया जाता है, जो भगवान को प्रिय होता है। इसके अतिरिक्त, फल और मिष्टान्न के साथ भूने आटे को चीनी मिलाकर एक प्रसाद, जिसे पंजीरी कहा जाता है, भी बनाया जाता है और उसे भी भोग लगाया जाता है।

सत्यनारायण व्रत कथा पुस्तिका के प्रथम अध्याय में सत्यनारायण भगवान की पूजा के निर्देश दिए गए हैं। इसमें व्रत-पालन के लिए नियम बताए गए हैं। पूजा स्थल पर गौ मूत्र से पवित्र कार्य करके वहां एक अल्पना बनानी चाहिए और उस पर पूजा की चौकी रखनी चाहिए। चौकी के चारों पाओं के पास केले के पेड़ को रखना चाहिए। इस चौकी पर शालिग्राम विष्णु, ठाकुर जी या श्री सत्यनारायण की प्रतिमा स्थापित की जाती है। पूजा करते समय सबसे पहले गणपति की पूजा करनी चाहिए और फिर इंद्रादि दशदिक्पाल, पंच लोकपाल, सीता राम, लक्ष्मण, राधा कृष्ण की पूजा की जानी चाहिए। इनके बाद ठाकुर जी और सत्यनारायण की पूजा करनी चाहिए। अंत में लक्ष्मी माता, महादेव और ब्रह्मा जी की पूजा की जानी चाहिए। पूजा के बाद सभी देवताओं की आरती करनी चाहिए और चरणामृत को लेकर प्रसाद वितरित करना चाहिए।

प्रथम अध्याय -सत्यनारायण व्रत कथा

सत्यनारायण व्रत कथा, का पूरा सन्दर्भ यह है की, पुराकाल में शौनकादिऋषि नैमिषारण्य, स्थित महर्षि सूत के आश्रम पर; पहुँचे, ऋषिगण, महर्षि सूत से प्रश्न करते हैं कि, लौकिक कष्टमुक्ति,,, सांसारिक सुख समृद्धि एवं पारलौकिक लक्ष्य की सिद्धि के लिए सरल, उपाय क्या है? महर्षि सूत; शौनकादिऋषियों को बताते हैं की ऐसा ही प्रश्न नारद जी ने भगवान विष्णु से किया था।

भगवान विष्णु ने नारद जी को बताया कि लौकिक क्लेशमुक्ति, सांसारिक सुख समृद्धि एवं पारलौकिक लक्ष्य, सिद्धि के लिए एक ही राजमार्ग है वह है सत्यनारायण व्रत। सत्यनारायण का अर्थ है सत्याचरण,, सत्याग्रह, सत्यनिष्ठा। संसार में सुखसमृद्धि की प्राप्ति सत्याचरणद्वारा ही संभव है। सत्य ही ईश्वर, हैं। सत्याचरण का अर्थ है ईश्वराराधन, भगवत्पूजा।

कथा का प्रारम्भ सूत जी द्वारा कथा सुनाने से होता है। नारद जी भगवान श्रीविष्णु के पास जाकर उनकी स्तुति करते हैं। स्तुति सुनने के, अनन्तर भगवान श्रीविष्णु जी ने, नारद जी से कहा- महाभाग! आप किस प्रयोजन से यहाँ आये हैं, आपके मन में क्या हैं? कहिये, वह सब कुछ मैं आपको बताउँगा।

नारद जी बोले – भगवन! मृत्युलोक में अपने पापकर्मों के द्वारा विभिन्न योनियों में उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकार के क्लेशों से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! किस लघु उपाय से उनके कष्टों का निवारण हो सकेगा, यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा हो, तो वह सब मैं सुनना चाहता हूँ, उसे बतायें।

श्री भगवान ने कहा – हे वत्स! संसार के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से आपने बहुत अच्छी बात पूछी है, जिस व्रत के, करने से प्राणी मोह से मुक्त हो जाता है, उसे आपको बताता हूँ, सुनें। हे वत्स! स्वर्ग और मृत्युलोक में दुर्लभ; भगवान सत्यनारायण का एक महान पुण्यप्रद व्रत है, आपके स्नेह के, कारण; इस समय मैं उसे कह रहा हूँ। अच्छी प्रकार विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण व्रत कथा करके मनुष्य शीघ्र ही सुख प्राप्त कर परलोक में मोक्ष प्राप्त, कर सकता है।

भगवान, की ऐसी वाणी सनुकर नारद मुनि ने कहा -प्रभो इस व्रत को करने का फल क्या है? इसका विधान क्या है? इस व्रत को किसने किया और इसे कब करना चाहिए? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये।

श्री भगवान ने कहा – यह सत्यनारायण व्रत कथा दुख-शोक आदि, का शमन करने वाला, धन-धान्य की वृद्धि करने वाला, सौभाग्य और सन्तान देने वाला तथा सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला है। जिस-किसी भी दिन भक्ति और श्रद्धा से, समन्वित होकर मनुष्य ब्राह्मणों और बन्धुबान्धवों के साथ धर्म में तत्पर होकर सायंकाल भगवान सत्यनारायण की पूजा करे। नैवेद्य के रूप में उत्तम कोटि के भोजनीय पदार्थ को सवाया मात्रा में भक्तिपूर्वक अर्पित करना चाहिए, केले के फल, घी, दूध, गेहूँ का चूर्ण अथवा गेहूँ के चूर्ण के अभाव में साठी चावल का चूर्ण, शक्कर या गुड़ – यह सब भक्ष्य सामग्री सवाया मात्रा में,,, एकत्र कर निवेदित करनी चाहिए।

बन्धु-बान्धवों के साथ श्री सत्यनारायण भगवान की कथा सुनकर दक्षिणा देनी चाहिए। तदनन्तर बन्धु-बान्धवों के साथ भोजन कराना चाहिए। भक्तिपूर्वक प्रसाद ग्रहण करके नृत्य-गीत आदि, का आयोजन करना चाहिए। तदनन्तर भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर जाना चाहिए, ऐसा करने से मनुष्यों की अभिलाषा अवश्य पूर्ण होती है, विशेष रूप से कलियुग में, पृथ्वीलोक में यह सबसे छोटा सा,,,, उपाय है।

दूसरा अध्याय-सत्यनारायण व्रत कथा

श्रीसूतजी ने कहा – हे द्विजों! अब, मैं फिर से पूर्वकाल में, जिसने भी इस सत्यनारायण व्रत कथा को किया था, उसके बारे में बताउँगा। एक खूबसूरत, रमणीय काशी नाम का शहर था, जहाँ एक बहुत ही, निर्धन ब्राह्मण रहता था। वो भूख और प्यास से बहुत, परेशान होकर, प्रतिदिन पृथ्वी पर भटकता रहता था।, भगवान ने जब उस दुखी ब्राह्मण को देखा, तब वह वृद्ध का रूप धारण करके, उस द्विज से पूछते हैं – हे द्विज! प्रतिदिन बहुत दुखी होकर तुम क्यों पृथ्वी पर? भ्रमण करते रेहते हो।, हे द्विजश्रेष्ठ! यह सब बतलाओ, मैं सुनने के लिए, उत्सुक हूं।

उस ब्राह्मण ने कहा – प्रभो! मैं बहुत ही दरिद्र हूँ और सिर्फ भिक्षा के लिए ही पृथ्वी पर, घूमता रहता हूँ। यदि आपके पास मेरी इस दरिद्रता को दूर करने का कोई उपाय हो तो, प्लीज़, कृपापूर्वक बतलाइये।

वह वृद्ध बोला – हे देव!, सत्यनारायण भगवान् विष्णु अभीष्ट फल देने वाले हैं। हे विप्र! तुम, उनका एक उत्तम व्रत करो, जिसे करने से मनुष्य, सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।

व्रत के विधान को भी यत्नपूर्वक; कहकर वृद्ध, रूपधारी भगवान् विष्णु वहीं, पर अंतर्धान हो गए। ‘वृद्ध ने जैसा कहा है, उस व्रत को मैं अच्छी प्रकार से वैसे ही करूँगा’ – यह सोचते हुए, उसे रात में नींद नहीं आयी।

अगले दिन, प्रातःकाल उठकर ‘सत्यनारायण व्रत कथा करूँगा’ ऐसा संकल्प कर, वह भिक्षा के लिए चल पड़ा। उस दिन भिक्षा में बहुत सा धन प्राप्त हुआ। उसी धन से उसने बन्धु-बान्धवों के साथ, भगवान सत्यनारायण का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह, श्रेष्ठ सभी दुखों से मुक्त होकर समस्त सम्पत्तियों से, सम्पन्न हो गया। उस दिन से, लेकर, प्रत्येक महीने उसने यह व्रत किया। इस तरह भगवान्, सत्यनारायण के इस व्रत को करके, वह श्रेष्ठ सभी पापों से मुक्त हो गया और, उसने दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त किया।

हे, विप्र! पृथ्वी पर जब भी कोई मनुष्य श्री सत्यनारायण का व्रत करेगा; उसी समय उसके समस्त दुख नष्ट, हो जायेंगे।! इस प्रकार, भगवान नारायण ने महात्मा नारदजी से जो कुछ कहा, मैंने वह सब आप लोगों से कह दिया, आगे अब और क्या कहूं?

हे मुने! इस पृथ्वी पर, उस से सुने हुए इस व्रत को, किसने किया? हम वह सब सुनना चाहते हैं, उस व्रत पर हमारी श्रद्धा, हो रही है।

श्रीसूत जी बोले – मुनियों!, पृथ्वी पर जिसने यह व्रत किया, उसे, आप लोग सुनें। एक बार वह द्विजश्रेष्ठ अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार बन्धु-बान्धवों तथा, परिवारजनों के साथ व्रत करने के लिए उद्यत हुआ। इसी बीच एक लकड़हारा, वहाँ आया और लकड़ी बाहर रखकर उस ब्राह्मण के घर गया। प्यास से व्याकुल, वह उस को व्रत करता हुआ देख प्रणाम करके उससे, बोला – प्रभो! आप यह क्या कर रहे हैं, इसके करने से, किस फल की प्राप्ति होती है? विस्तारपूर्वक, मुझसे कहिये।

विप्र, ने कहा – यह सत्यनारायण का व्रत है, जो सभी मनोरथों को प्रदान करने वाला है। उसी के प्रभाव से, मुझे यह सब महान धन-धान्य आदि प्राप्त हुआ है। जल पीकर तथा प्रसाद, ग्रहण करके वह नगर, चला गया। सत्यनारायण देव के लिए मन से, ऐसा सोचने लगा कि ‘आज लकड़ी बेचने से जो धन प्राप्त होगा, उसी, से भगवान सत्यनारायण का श्रेष्ठ व्रत करूँगा।’ इस प्रकार मन से चिन्तन करता हुआ लकड़ी को मस्तक पर रख कर उस सुन्दर नगर में गया, जहाँ धन-सम्पन्न लोग रहते थे; उस दिन उसने लकड़ी का दुगुना मूल्य प्राप्त, किया।

इसके बाद, प्रसन्न हृदय होकर वह पके हुए केले का फल, शर्करा, घी, दूध और गेहूँ का चूर्ण सवाया मात्रा में, लेकर अपने घर आया। तत्पश्चात उसने अपने बान्धवों को बुलाकर विधि-विधान से भगवान श्री, सत्यनारायण का व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से वह धन-पुत्र से सम्पन्न हो गया और इस लोक में अनेक, सुखों का उपभोग कर, अंत में सत्यपुर अर्थात् बैकुण्ठलोक चला गया।

तीसरा अध्याय- सत्यनारायण व्रत कथा

श्री, सूतजी बोले — श्रेष्ठ, मुनियों! अब मैं पुनः आगे की कथा कहूँगा,, आप लोग सुनें। प्राचीन काल में, उल्कामुख नाम का एक राजा था। वह जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा अत्यंत बुद्धिमान था, वह विद्वान राजा प्रतिदिन देवालय जाता और धन देकर सन्तुष्ट करता था। कमल के समान मुख वाली उसकी धर्मपत्नी शील, विनय एवं सौन्दर्य आदि गुणों से सम्पन्न तथा पतिपरायणा थी। राजा एक दिन, अपनी? धर्मपत्नी के, साथ भद्रशीला नदी के तट पर श्रीसत्यनारायण का व्रत कर रहा था, उसी समय व्यापार के अनेक प्रकार की पुष्कल धनराशि से सम्पन्न एक साधु नाम का बनिया वहाँ आया। पानी में मछलिया भी जैसे धर्म का अनुसरण कर रही थी, भद्रशीला नदी के तट पर नाव को स्थापित कर वह!! राजा के समीप गया और राजा को उस व्रत में दीक्षित देखकर विनयपूर्वक पूछने लगा।

साधु ने कहा – राजन्! आप भक्तियुक्त चित्त से यह क्या कर रहे हैं,? कृपया वह सब बताइये, इस समय मैं सुनना चाहता हूँ।

राजा बोले – हे साधो;! पुत्र आदि की प्राप्ति की कामना से अपने बन्धु-बान्धवों के साथ मैं अतुल तेज सम्पन्न भगवान् विष्णु का व्रत एवं पूजन कर रहा हूँ।

राजा की बात सुनकर साधु ने आदरपूर्वक कहा,, – राजन्! इस विषय में आप मुझे सब कुछ विस्तार से बतलाइये, आपके कथनानुसार मैं व्रत एवं पूजन करूँगा। मुझे भी सन्तति नहीं है। ‘इससे अवश्य ही सन्तति प्राप्त होगी।’ ऐसा विचार कर वह व्यापार से निवृत्त हो आनन्दपूर्वक अपने घर आया। उसने, अपनी भार्या से सन्तति प्रदान करने वाले इस सत्यव्रत को विस्तार पूर्वक बताया तथा; ‘जब मुझे सन्तति प्राप्त होगी तब मैं इस व्रत को करूँगा’ – इस प्रकार उस साधु ने अपनी भार्या लीलावती से कहा।

एक दिन उसकी लीलावती नाम की सती-साध्वी भार्या पति के साथ आनन्द चित्त से ऋतुकालीन धर्माचरण में प्रवृत्त हुई और भगवान् श्रीसत्यनारायण की कृपा से उसकी वह भार्या गर्भिणी हुई। दसवें महीने में उससे कन्यारत्न की? उत्पत्ति हुई और वह शुक्लपक्ष के चंद्रमा की भाँति दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उस कन्या का ‘कलावती’ यह नाम रखा गया। इसके बाद एक दिन लीलावती ने अपने स्वामी से मधुर वाणी में कहा; – आप पूर्व में संकल्पित श्री सत्यनारायण के व्रत को क्यों नहीं कर रहे हैं,

साधु बोला – ‘प्रिये! इसके विवाह के समय व्रत करूंगा।’ इस प्रकार अपनी पत्नी को भली-भाँति आश्वस्त कर वह व्यापार करने के लिए नगर की ओर चला गया। इधर कन्या कलावती पिता के घर में बढ़ने लगी। तदनन्तर धर्मज्ञ साधु ने नगर में सखियों के साथ क्रीड़ा करती हुई अपनी कन्या को विवाह योग्य देखकर, आपस में मन्त्रणा करके ‘कन्या विवाह के लिए श्रेष्ठ वर का अन्वेषण करो’ – ऐसा दूत से कहकर शीघ्र ही उसे भेज दिया। उसकी आज्ञा प्राप्त करके, दूत कांचन नामक नगर में गया और वहां से एक वणिक का पुत्र लेकर आया। उस साधु ने उस वणिक के पुत्र को सुन्दर और गुणों से सम्पन्न देखकर अपनी!! जाति के लोगों तथा बन्धु-बान्धवों के साथ सन्तुष्ट चित्त हो विधि-विधान से, वणिकपुत्र के हाथ में कन्या का दान कर दिया।

उस, समय, वो साधु बनिया, दुर्भाग्य से; भगवान् का, वो उत्तम व्रत भूल गया था! पूर्व संकल्प के अनुसार विवाह के, समय में, व्रत न करने के कारण, भगवान उस पर रुष्ट हो गए थे। कुछ, समय के, पश्चात उसके व्यापारकर्म में कुशल वो साधु बनिया; काल की प्रेरणा से? अपने दामाद के साथ व्यापार करने के लिए, समुद्र के, समीप स्थित रत्नसारपुर नामक सुंदर नगर में गया। और, अपने श्रीसम्पन्न दामाद के साथ वहाँ, व्यापार करने लगा। उसके बाद वे दोनों राजा चंद्रकेतु, के रमणीय उस नगर में गए थे। उसी समय भगवान् श्रीसत्यनारायण ने उसे भ्रष्टप्रतिज्ञ देखकर, ‘इसे दारुण; कठिन और महान् दुख प्राप्त होने वाला है’ – यह, शाप दे दिया।

एक दिन एक चोर राजा चन्द्रकेतु के, धन को चुराकर वहीं आया; जहाँ दोनों वणिक स्थित थे। वह! अपने पीछे दौड़ते हुए दूतों, को देखकर भयभीतचित्त से, धन वहीं छोड़ कर शीघ्र ही छिप गया। इस, के बाद राजा के दूत वहाँ आ गए; जहाँ वह साधु वणिक था। वहाँ राजा के धन को देखकर वे दूत, उन दोनों वणिकपुत्रों को बाँधकर ले; आए और हर्षपूर्वक दौड़ते हुए। राजा से बोले – ‘प्रभो! हम दो चोर पकड़ लाए हैं; इन्हें देख कर आप आज्ञा दें।’ राजा की आज्ञा से दोनों शीघ्र ही दृढ़तापूर्वक बाँध कर बिना विचार किए महान कारागार में डाल दिए गए थे! भगवान् सत्यदेव की माया से किसी ने उन दोनों की बात नहीं सुनी और राजा चन्द्रकेतु ने उन दोनों का धन भी ले लिया।

भगवान के शाप से, वणिक के घर में उसकी भार्या भी अत्यंत दुखी हो गई, थी और उनके घर में सारा-का-सारा जो धन था वो चोर ने चुरा लिया था। लीलावती शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं से युक्त भूख और प्यास से दुखी हो अन्न की चिन्ता से दर-दर भटकने लगी। कलावती, कन्या भी, भोजन के लिए इधर-उधर; प्रतिदिन घूमने लगी। एक दिन भूख से, पीड़ित कलावती एक के घर गई। वहां जाकर उसने श्रीसत्यनारायण के व्रत-पूजन, को देखा। वहां बैठकर उसने कथा सुनी और वरदान मांगा। उसके बाद, प्रसाद ग्रहण करके; वह, कुछ रात होने पर घर गई।

माता ने कलावती कन्या से प्रेमपूर्वक पूछा – पुत्री! रात में तू कहाँ रुक गई थी? तुम्हारे, मन, में क्या है? कलावती कन्या ने तुरंत माता से कहा – माँ! मैंने एक घर में मनोरथ प्रदान करने वाला व्रत देखा है। कन्या की उस बात को, सुनकर; वह वणिक की भार्या व्रत, करने को उद्यत हुई और प्रसन्नमन से उस साध्वी ने, बन्धु-बांधवों के साथ भगवान् श्रीसत्यनारायण का व्रत किया तथा, इस प्रकार प्रार्थना की – ‘भगवन! आप हमारे पति एवं जामाता के अपराध को, क्षमा करें; वे दोनों अपने घर शीघ्र आ जाएं।’ इस व्रत से, भगवान सत्यनारायण पुनः संतुष्ट हो, गए तथा उन्होंने नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को स्वप्न दिखाया और; स्वप्न में कहा – ‘नृपश्रेष्ठ! प्रातःकाल, दोनों वणिकों को छोड़ दो और वह सारा धन भी; दे दो, जो तुमने उनसे इस; समय ले लिया है, अन्यथा राज्य; धन एवं पुत्रसहित तुम्हारा सर्वनाश कर दूंगा।’

राजा से स्वप्न में ऐसा कहकर, भगवान सत्यनारायण अंतर्धान हो गए थे। इसके बाद प्रातः काल राजा ने अपने सभासदों के साथ, सभा में बैठ कर, अपना स्वप्न लोगों को बताया और कहा -‘ दोनों बंदी वणिकपुत्रों को शीघ्र ही मुक्त कर दो!’ राजा की, ऐसी बात सुनकर वे राजपुरुष दोनों महाजनों को बंधनमुक्त करके राजा के सामने लाकर, विनयपूर्वक बोले – ‘महाराज! बेड़ी-बंधन से मुक्त करके दोनों वणिक पुत्र लाए गए हैं।’ इसके बाद दोनों, महाजन नृपश्रेष्ठ चंद्रकेतु को प्रणाम करके अपने पूर्व-वृतान्त का, स्मरण करते हुए भयविह्वल हो गए और कुछ बोल न सके।

चौथा अध्याय-सत्यनारायण व्रत कथा

श्रीसूत जि कहे – एक साधु व्यापारी ने मंगलाचरण किया और ब्राह्मणों को धन अर्पित कर अपने शहर की ओर रवाना हो गया। कुछ दूर चलने के बाद, भगवान सत्यनारायण को साधु की सच्चाई का परीक्षण करने की इच्छा हुई। उन्होंने पूछा – ‘हे साधु! तुम्हारी किश्ती में क्या समाया हुआ है?’ तब, धन के अहंकार में भरे दोनों व्यापारियों ने उपेक्षा से हंसते हुए जवाब दिया – ‘ओ दंडधारी! क्यूँ जानना चाहते हो? कोई वस्तु लेना चाहते हो क्या? हमारी नाव में तो सिर्फ वेल और पत्तियाँ भरी हैं।’ उनकी कठोर बोली सुनकर – ‘तुम्हारी वाणी सच में बदल जाए’ – ऐसा कहे बिना दंडधारी संन्यासी रूप में भगवान समुद्र के तट पर जा बैठे।

दंडधारी के जाने के बाद, साधु की प्रतीक्षा समाप्त हुई और वह उल्टी हुई अर्थात् जल के ऊपर उतराई नाव को देखकर अचंभित हो गया और नाव में वेल और पत्तियाँ देख धरती पर गिर पड़ा। होश में आने पर व्यापारी चिंतित हो गया। तब उसके समधी ने कहा – ‘तुम क्यों उदास होते हो? दंडधारी ने शाप देदिया है, पर यदि वे चाहें तो सब कुछ दोबारा बना सकते हैं, इसमें कोई दो राय नही। इसलिए हम उनकी शरण में जाएँ, वहीं हमारी मनोकामना पूर्ण होगी।’ समधी की यह बात सुन वह साधु व्यापारी उनके पास पहुँचा और वहाँ दंडधारी को देख उन्हें भक्ति भाव से प्रणाम किया और आदर के साथ कहने लगा – मैंने आपके सामने जो कुछ भी कहा, उस असत्य वचन के लिए मुझे क्षमा करें – ऐसा कहके बार-बार प्रणाम करते हुए वह गहरे दुख में डूब गया।

उसे रोते हुए देखकर दंडधारी ने कहा – ‘हे नासमझ! मत रोओ, मेरी बातों को ध्यान से सुनो। मेरी अर्चना से विमुख होने के कारण और मेरे आदेशानुसार ही तुमने कई बार दुःख उठाया है।’ भगवान की ऐसी बातें सुनकर वह उनकी स्तुतियाँ गाने लगा।

साधु ने कहा – ‘हे ईश्वर! यह विस्मयकारी है कि आपकी माया में मोहित होकर ब्रह्मा जैसे देवता भी आपके गुणों और स्वरूपों को सही तरह से नहीं पहचान पाते, फिर मैं मूढ़ कैसे जान सकता हूं! आप कृपालु हों। मैं अपने धन संपदा के अनुरूप आपका पूजन करूंगा। मैं आपकी शरण में आया हूं। मेरी नाव में रखा सारा धन और मैं, दोनों की रक्षा करें।’ उस व्यापारी की भक्तिपूर्ण बातें सुनकर भगवान जनार्दन प्रसन्न हो गए।

भगवान विष्णु ने उसे वांछित वरदान दिया और उसी स्थान पर अन्तर्धान हो गए। उसके बाद वह साधु अपनी नाव में चढ़ा और उसे धन-धान्य से भरा पाकर ‘भगवान सत्यदेव की कृपा से हमारा मनोरथ पूरा हुआ’ – ऐसा कहकर अपने परिजनों के साथ भगवान का उपयुक्त पूजन किया। भगवान श्री सत्यनारायण की अनुकंपा से वह परमानंद में पूरित हो गया और नाव को संभाल कर अपने देश की ओर चल पड़ा। साधु व्यापारी ने अपने समधी से कहा – ‘देखो, मेरी रत्नपूरी शहर दिखाई दे रही है।’ इसके बाद उसने अपने धन की सुरक्षा के लिए अपने शहर में एक दूत को अपने आगमन की सूचना देने भेजा।

उसके बाद वह दूत नगर में जाकर, साधु की भार्या को देख, हाथ जोड़कर प्रणाम करता है और उसके लिए एक अभीष्ट बात कहता है की- “सेठ जी, अपने दामाद और बन्धु-वर्ग के साथ बहुत सारे धन-धान्य से सम्पन्न होकर, नगर के, निकट पधार गये हैं।” दूत के मुख से यह बात सुनकर, वह महान आनन्द से विह्वल हो गयी और उस साध्वी ने श्री सत्यनारायण की पूजा करके, अपनी पुत्री से कहा की-“मैं साधु के दर्शन के लिए जारही हूं, तुम शीघ्र आओ।” माता, का ऐसा वचन सुनकर, व्रत को समाप्त करके प्रसाद का परित्याग कर वह कलावती भी अपने पति का दर्शन करने के लिए चल पड़ी? इससे, भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गये और उन्होंने उसके पति को तथा नौका को धन के साथ हरण करके जल में डुबो दिया।

इसके बाद, कलावती कन्या अपने पति को न देख, महान शोक से रुदन करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। नाव का अदर्शन तथा कन्या को, अत्यन्त दुखी देख भयभीत मन से साधु बनिया सोचा की – यह क्या आश्चर्य हो, गया? नाव का, संचालन करने वाले भी सभी चिन्तित हो गये? तदनंतर, वह लीलावती भी कन्या को देखकर विह्वल हो गयी और अत्यन्त दुख से विलाप करती हुई अपने पति से इस प्रकार बोली – “अभी-अभी नौका के साथ वह कैसे अलक्षित हो गया न, जाने किस देवता की उपेक्षा से वह नौका हरण कर ली गयी अथवा श्रीसत्यनारायण का माहात्म्य; कौन जान सकता है!” ऐसा कहकर वह स्वजनों के साथ विलाप करने, लगी और कलावती कन्या को गोद में लेकर, रोने लगी।

कलावती कन्या भी अपने पति के नष्ट हो जाने पर दुखी हो गयी और पति की पादुका लेकर उनका अनुगमन करने के लिए उसने मन में निश्चय किया? कन्या के इस प्रकार के आचरण को देख भार्यासहित वह धर्मज्ञ साधु बनिया अत्यन्त शोक-संतप्त हो गया और सोचने लगा – या तो भगवान सत्यनारायण ने, यह अपहरण किया है अथवा हम सभी भगवान सत्यदेव की माया से मोहित हो गये हैं। अपनी धन शक्ति के अनुसार मैं भगवान श्री सत्यनारायण की पूजा करूँगा; सभी को बुलाकर इस प्रकार कहकर उसने अपने मन की इच्छा प्रकट की और बारम्बार भगवान सत्यदेव को दण्डवत प्रणाम, किया। इससे दीनों के परिपालक भगवान सत्यदेव प्रसन्न हो गये? भक्तवत्सल भगवान ने कृपापूर्वक कहा – “तुम्हारी कन्या प्रसाद छोड़कर अपने पति को, देखने चली आयी है, निश्चय ही इसी कारण उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके वह पुनः आये तो हे साधु बनिया तुम्हारी पुत्री पति को प्राप्त करेगी, इसमें, संशय नहीं।”

कन्या कलावती भी आकाशमण्डल से ऐसी वाणी सुनकर शीघ्र ही घर गयी और वहाँ पहुँचकर उसने प्रसाद ग्रहण किया। पुनः आकर, स्वजनों तथा अपने पति को देखा। तब कलावती कन्या ने अपने पिता से कहा – “अब तो घर चलें? विलम्ब क्यों, कर रहे हैं?” कन्या की वह बात सुनकर वणिकपुत्र सन्तुष्ट हो गया और विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण का पूजन करके धन तथा बन्धु-बान्धवों के साथ अपने घर गया, तदनंतर पूर्णिमा तथा संक्रान्ति पर्वों पर भगवान सत्यनारायण का पूजन करते हुए इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह सत्यपुर बैकुण्ठलोक में चला गया।

पाँचवाँ अध्याय-सत्यनारायण व्रत कथा

श्रीसूत जी बोले – श्रेष्ठ मुनियों! अब, इसके बाद मैं दूसरी, कथा कहूँगा; आप लोग सुनें, अपनी प्रजा का पालन करने में तत्पर तुंगध्वज नामक एक राजा था। उसने, सत्यदेव के प्रसाद का परित्याग करके, दुख प्राप्त किया। एक बार, वह वन में जाकर और वहां बहुत से पशुओं को मारकर वटवृक्ष के नीचे आया। वहां उसने देखा कि गोपगण बन्धु-बान्धवों के साथ, संतुष्ट होकर, भक्तिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा कर रहे हैं। राजा! यह देखकर भी अहंकारवश; न तो वहां गया और न ही उसने भगवान सत्यनारायण को, प्रणाम ही किया। पूजन के बाद, सभी गोपगण भगवान का, प्रसाद राजा के समीप रखकर वहां से, लौट आये और, इच्छानुसार उन, सभी ने भगवान का प्रसाद ग्रहण किया। इधर! राजा को प्रसाद का परित्याग करने से, बहुत दुख हुआ।

उसका, सम्पूर्ण धन-धान्य एवं सभी सौ पुत्र नष्ट हो गये। राजा ने मन में यह निश्चय किया, कि, अवश्य ही भगवान सत्यनारायण ने हमारा नाश कर दिया है। इसलिए मुझे, वहां जाना चाहिए जहां श्री सत्यनारायण का पूजन हो, रहा था। ऐसा मन में निश्चय करके वह राजा गोपगणों के, समीप गया और उसने गोपगणों के साथ भक्ति-श्रद्धा से युक्त, होकर विधिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा की। भगवान सत्यदेव की कृपा से वह पुनः, धन और पुत्रों से सम्पन्न हो गया तथा, इस लोक में सभी सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुआ।

श्रीसूत जी कहते हैं – जो व्यक्ति इस परम दुर्लभ श्री सत्यनारायण व्रत कथा को करता है और पुण्यमयी तथा, फलप्रदायिनी भगवान की कथा को भक्तियुक्त, होकर सुनता है; उसे भगवान सत्यनारायण की कृपा से धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है। दरिद्र धनवान हो जाता है, बन्धन में, पड़ा हुआ बन्धन से मुक्त हो जाता है; डरा हुआ व्यक्ति भय मुक्त हो जाता, है – यह, सत्य बात है, इसमें संशय नहीं। इस लोक में वह सभी ईप्सित फलों का भोग प्राप्त करके, अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को जाता है। इस प्रकार मैंने, आप लोगों से भगवान सत्यनारायण के, व्रत को कहा, जिसे करके मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।

कलियुग में तो भगवान सत्यदेव की पूजा विशेष फल प्रदान, करने वाली है। भगवान विष्णु को ही कुछ लोग काल, कुछ लोग सत्य, कोई ईश और, कोई सत्यदेव तथा दूसरे लोग सत्यनारायण नाम से कहेंगे। अनेक रूप धारण, करके भगवान सत्यनारायण सभी का मनोरथ, सिद्ध करते हैं। कलियुग में सनातन भगवान विष्णु ही सत्यव्रत, रूप धारण करके सभी का मनोरथ, पूर्ण करने वाले होंगे। हे श्रेष्ठ, मुनियों! जो व्यक्ति नित्य भगवान सत्यनारायण की इस व्रत-कथा को पढ़ता है, सुनता है, भगवान सत्यारायण की कृपा से उसके सभी पाप, नष्ट हो जाते हैं। हे मुनीश्वरों! पूर्वकाल में जिन लोगों ने भगवान सत्यनारायण का व्रत किया था, उसके अगले जन्म का वृतान्त, कहता हूं आप लोग सुने।

महान, प्रज्ञासम्पन्न सत्यनारायण व्रत करने के प्रभाव से दूसरे जन्म में सुदामा हुए और उस जन्म में भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। लकड़हारा भिल्ल गुहों का राजा हुआ और अगले जन्म में उसने भगवान श्रीराम की सेवा करके मोक्ष प्राप्त किया। महाराज, उल्कामुख दूसरे जन्म में राजा दशरथ हुए, जिन्होंने श्रीरंगनाथजी की पूजा करके अन्त में वैकुण्ठ प्राप्त किया। इसी प्रकार, धार्मिक और सत्यव्रती साधु पिछले जन्म के सत्यव्रत के प्रभाव से दूसरे जन्म में, मोरध्वज नामक राजा हुआ। उसने आरे से चीरकर अपने पुत्र की आधी देह भगवान विष्णु को अर्पित कर के मोक्ष प्राप्त, किया। महाराजा तुंगध्वज जन्मान्तर में स्वायम्भुव मनु हुए और भगवत्सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्यों का अनुष्ठान करके वैकुण्ठलोक को प्राप्त, हुए। जो गोपगण थे, वे सब जन्मान्तर में व्रजमण्डल में निवास करने वाले गोप हुए और सभी राक्षसों का संहार करके उन्होंने भी भगवान का शाश्वत धाम गोलोक, प्राप्त किया।

इस, प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अन्तर्गत रेवाखण्ड में श्रीसत्यनारायणव्रत कथा का यह पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

समीक्षा-सत्यनारायण व्रत कथा

सत्यनारायण व्रत कथा के, पात्र दो कोटि में, आते हैं; निष्ठावान सत्यव्रती एवं, स्वार्थबद्ध सत्यव्रती; शतानन्द,काष्ठ विक्रेता भील और राजा उल्कामुख, निष्ठावान सत्यव्रती थे- इन पात्रों ने,, सत्याचरण और सत्यनारायण भगवान की पूजार्चा करके? लौकिक एवं, पारलौकिक सुखों की प्राप्ति की? शतानन्दअति दीन ब्राह्मण थे, भिक्षावृत्ति अपनाकर वे अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करते थे उनकी तीव्र सत्यनिष्ठा के कारण, उन्होंने सत्याचरण का व्रत लिया। भगवान सत्यनारायण की विधिवत् पूजार्चा की! वे इहलोकेसुखंभुक्त्वाचान्तंसत्यपुरंययौ (कुछ पेड़ कभी नहीं हंसते, लेकिन कई फूल गाते हैं।) की स्थिति में आए। काष्ठ विक्रेता भील, भी अति निर्धन था, किसी तरह, लकड़ी बेचकर अपना और; अपने परिवार का पेट पालता था! उसने भी! सम्पूर्ण निष्ठा के साथ सत्याचरण किया सत्यनारायण भगवान की पूजार्चा की। राजा उल्कामुख भी निष्ठावान सत्यव्रती थे वे नियमित रूप से भद्रशीलानदी के, किनारे सपत्नीक; सत्यनारायण भगवान की पूजार्चा करते थे। सत्याचरण ही उनके जीवन का मूलमन्त्र था।

दूसरी तरफ, साधु वणिक एवं राजा तुंगध्वज,,, स्वार्थ बद्धकोटि के सत्यव्रती थे, स्वार्थ साधन हेतु बाध्य होकर, इन दोनों पात्रों ने, सत्याचरण किया ; सत्यनारायण भगवान की पूजार्चा की। साधु वणिक की सत्यनारायण भगवान में निष्ठा नहीं थी। सत्यनारायण पूजार्चा का संकल्प लेने के उपरान्त उसके परिवार; में कलावती नामक कन्या रत्न का जन्म हुआ, कन्या जन्म के पश्चात उसने अपने संकल्प को भुला दिया और सत्यनारायण भगवान की पूजार्चा नहीं की कन्या के विवाह! तक के लिए टाल दी? कन्या के विवाह अवसर पर भी उसने सत्याचरण एवं पूजार्चा से मुंह मोड़ लिया और दामाद के साथ व्यापार यात्रा पर चल पड़ा। दैवयोग से रत्नसारपुर में श्वसुर दामाद के ऊपर चोरी का आरोप लगा; यहाँ उन्हें राजा चंद्रकेतु के कारागार में रहना पड़ा। श्वसुर और दामाद कारागार से मुक्त हुए तो श्वसुर (साधु वाणिक) ने एक दण्डीस्वामी से झूठ बोल दिया कि उसकी नौका में? रत्नादि नहीं मात्र लता पत्र है। इस मिथ्यावादन के कारण उसे संपत्ति विनाश का; कष्ट भोगना पड़ा। अन्तत:बाध्य होकर उसने सत्यनारायण भगवान का व्रत किया। साधु वाणिक के मिथ्याचार के कारण उसके घर पर भी भयंकर चोरी हो गई। पत्नी पुत्र दाने दाने को मुहताज, इसी बीच उन्हें साधु वाणिक के सकुशल घर लौटने की सूचना मिली। उस समय कलावती अपनी माता लीलावती के साथ सत्यनारायण भगवान की पूजार्चा_कर रही थी। समाचार सुनते ही कलावती अपने पिता और पति से, मिलने के लिए दौडी। इसी हड़बड़ी में वह भगवान का प्रसाद ग्रहण करना भूल गई प्रसाद न ग्रहण करने के कारण साधु वाणिक और उसके दामाद नाव सहित समुद्र में डूब गए. फिर अचानक कलावती को अपनी भूल की याद आई वह दौडी दौडी घर आई? और भगवान का प्रसाद लिया. इसके बाद, सब कुछ ठीक हो गया, लगभग यही स्थिति राजा तुंगध्वज की भी थी। एक स्थान पर गोपबंधु; भगवान सत्यनारायण की पूजा कर रहे थे, राजसत्तामदांध तुंगध्वज्!,न तो पूजा;स्थल पर गए और! न ही, गोप बंधुओं द्वारा प्रदत्त भगवान? का प्रसाद ग्रहण किया? इसीलिए उन्हें कष्ट भोगना पड़ा. अंतत:बाध्य, होकर? उन्होंने सत्यनारायण भगवान? की पूजार्चा की, और सत्याचरण का व्रत लिया।

सत्यनारायण व्रतकथा; के उपर्युक्त पांचों पात्र, मात्र कथापात्र ही नहीं है, वे मानव मन की दो प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं? ये प्रवृत्तियां हैं,, सत्याग्रह एवं मिथ्याग्रह! लोक में सर्वदा;इन दोनों प्रवृत्तियों के धारक रहते हैं; इन पात्रों के माध्यम से स्कंदपुराण;यह संदेश देना चाहता है कि, निर्धन एवं सत्ताहीन; व्यक्ति भी सत्याग्रही, सत्यव्रती, सत्यनिष्ठ हो सकता है. धन तथा सत्तासंपन्न व्यक्ति मिथ्याग्रही हो सकता है. शतानन्द और काष्ठ-विक्रेता भील निर्धन और सत्ताहीन थे, फिर भी इनमें तीव्र सत्याग्रहवृत्ति थी, इसके विपरीत साधु वाणिक एवं राजा तुंगध्वज धनसम्पन्न एवं सत्तासम्पन्न थे, पर उनकी वृत्ति मिथ्याग्रही थी। सत्ता एवं धनसम्पन्न व्यक्ति में सत्याग्रह हो, ऐसी घटना विरल होती है; सत्यनारायण व्रतकथा के पात्र राजा उल्कामुख ऐसी ही विरल कोटि के व्यक्ति थे, पूरी सत्यनारायण व्रतकथा का निहितार्थ यह है कि; लौकिक एवं परलौकिक हितों की साधना के लिए मनुष्य को सत्याचरण का व्रत, लेना चाहिए; सत्य ही, भगवान है; सत्य ही विष्णु है, लोक में सारी बुराइयों; सारे क्लेशों, सारे संघर्षो का मूल कारण है; सत्याचरण का अभाव; सत्यनारायण व्रत कथा पुस्तिका में इस संबंध में श्लोक इस प्रकार है,

” यत्कृत्वासर्वदु:खेभ्योमुक्तोभवतिमानव:। विशेषत:कलियुगेसत्यपूजाफलप्रदा। केचित् कालंवदिष्यन्तिसत्यमीशंतमेवच; सत्यनारायणंकेचित्, सत्यदेवंतथाऽपरे। नाना रूपधरोभूत्वासर्वेषामीप्सितप्रद:। भविष्यतिकलौविष्णु: सत्यरूपीसनातन:।”

सत्यनारायण व्रत कथा पुस्तिका में इस संबंध में श्लोक

अर्थात्, सत्यनारायण व्रत का अनुष्ठान करके मनुष्य सभी दु:खों से मुक्त हो जाता है; कलिकाल में सत्य की पूजा विशेष रूप से फलदायी होती है, सत्य के अनेक नाम है, यथा-सत्यनारायण सत्यदेव, सनातन सत्यरूपी विष्णु भगवान कलियुग में अनेक रूप धारण करके लोगों को मनोवांछित फल देंगे।

उद्देश्यसत्यनारायण व्रत कथा

वेदों के, अनुसार, सत्यनारायण कथा करने से, हजारों वर्षों के यज्ञ के बराबर फल मिलता है। सत्यनारायण कथा; को सुनने से भी, सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथा, के अनुसार, सत्यनारायण कथा को सुनने वाले को उपवास अवश्य, करना चाहिए, ऐसा माना जाता है की श्री हरि विष्णु इससे जीवन की सभी समस्याओं को दूर करने में सक्षम हैं! स्कंद पुराण के अनुसार, सत्यनारायण भगवान विष्णु का स्वरुप है, कहा जाता है कि, ऐसी स्थिति में, सत्यनारायण कथा सुनने और करने से भगवान विष्णु भक्त पर कृपा करते हैं। यह एक बहुत ही अजीब बात है, लेकिन, पानी में दूध मिलाकर पीने से भी, आपको सत्यनारायण की कथा के समान ही फल प्राप्त हो सकता है। ऐसा कहा जाता है कि; यह, हर किसी के जीवन में खुशी और शांति लाते हैं।

सत्यनारायण व्रत कथा में क्या करें और क्या न करें

सत्यनारायण व्रत कथा में कुछ नियमों का पालन करना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। ये नियम व्रत के सफलता और पूजन की प्रभावीता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

क्या करें:

  • व्रत की शुरुआत में, शुभ संकल्प लेकर इसे आरंभ करें। इससे आपका मन एकाग्र होता है और पूजन में समर्पित होता है।
  • सत्यनारायण भगवान के व्रत में पाक और निष्काम भाव से व्रत का पालन करें।
  • भगवान की पूजा के लिए उपयुक्त स्थान चुनें और उनकी मूर्ति या चित्र के सामने पूजा करें। ध्यान और भक्ति से पूजन करें।
  • सत्यनारायण कथा का पाठ करें। इसमें भगवान के लीला और उनके अनुग्रहों का वर्णन होता है।
  • व्रत के अंत में प्रसाद को सभी के बीच बाँटें। इससे सभी को आशीर्वाद मिलता है।

क्या न करें:

  • व्रत के दिन नकारात्मक विचारों, कार्यक्रमों और उत्पीड़न की गतिविधियों में शामिल न हों
  • व्रत के दिन अशुद्ध और नकारात्मक आहार न लें।
  • पूजन के दौरान अव्यवस्थित और अशिष्ट रहने से बचें।
  • व्रत के दिन शिष्टाचार से अलग न हों। धर्मिक नियमों और निष्काम कर्मों का पालन करें।
  • व्रत के दिन आपको क्रोध और असंतोष के भावों से दूर रहना चाहिए। इसके बजाय, शांति और संतोष के साथ ध्यान में रहना चाहिए।

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प्रश्न:FAQ

1.सत्यनारायण व्रत कथा को घर पर कैसे करें?

उत्तर: सत्यनारायण कथा को घर पर करने के लिए, पहले पूजा सामग्री तैयार करें और फिर पूजा के अनुसार शुभ मुहूर्त में कथा का आयोजन करें।

2.सत्यनारायण की असली कथा कब करनी चाहिए?

उत्तर: सत्यनारायण की असली कथा को पूर्णिमा के दिन या अमावस्या के दिन करना शुभ माना जाता है।

3.सत्यनारायण भगवान की पूजा कैसे करें?

उत्तर:सत्यनारायण भगवान की पूजा के लिए, प्रारंभ में देवी-देवताओं का ध्यान करें, फिर गणेश और हनुमान जी को पूजा करें, और फिर सत्यनारायण भगवान को पूजें।

4.क्या सत्यनारायण व्रत कथा पूजा बिना पत्नी के की जा सकती है?

उत्तर: हां, सत्यनारायण पूजा को बिना पत्नी के भी किया जा सकता है।

5.सत्यनारायण व्रत कथा पूजा में कौन सा प्रसाद चढ़ाया जाता है?

उत्तर: सत्यनारायण पूजा में प्रसाद के रूप में मूंग दाल, चना, गुड़, दालिया, फल, और मिष्ठान चढ़ाया जाता है।

6.सत्यनारायण व्रत कथा सुनने से क्या लाभ होता है?

उत्तर: सत्यनारायण कथा सुनने से आत्मिक शांति और धार्मिक उन्नति होती है।

7.घर में सत्यनारायण व्रत कथा कराने से क्या होता है?

उत्तर: घर में सत्यनारायण कथा कराने से परिवार का सुख और समृद्धि बढ़ती है, और घर में शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

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